बिकता यहाँ सब कुछ है अब
बाज़ार सबके सर चढ़ा है ,
बादल की साजिश से अंधेरों
का घना पहरा पड़ा है
न मुफ्त में अब प्रेम है, न है घृणा ही
न अन्य कोई मानवीय संवेदना ही
ये सभी तो बाज़ार का श्रृंगार हैं अब
व्यापारियों का इन पे भी अधिकार है अब
आज जैसे सभी कुछ पर
लेप पैसे का चढ़ा है
बादल की.......................
शिक्षा भी अब बाज़ार में बिकने लगी है
ऊँचे घरों-महलों में अब टिकने लगी है
मूल्य का अब मांग ही से प्रीति जैसे हो
बस यही बाज़ार की अब नीति जैसे हो
एक कवि को आज फिर
लोगों की पीड़ा का पड़ा है
बादल की.......................
बाज़ार सबके सर चढ़ा है ,
बादल की साजिश से अंधेरों
का घना पहरा पड़ा है
न मुफ्त में अब प्रेम है, न है घृणा ही
न अन्य कोई मानवीय संवेदना ही
ये सभी तो बाज़ार का श्रृंगार हैं अब
व्यापारियों का इन पे भी अधिकार है अब
आज जैसे सभी कुछ पर
लेप पैसे का चढ़ा है
बादल की.......................
शिक्षा भी अब बाज़ार में बिकने लगी है
ऊँचे घरों-महलों में अब टिकने लगी है
मूल्य का अब मांग ही से प्रीति जैसे हो
बस यही बाज़ार की अब नीति जैसे हो
एक कवि को आज फिर
लोगों की पीड़ा का पड़ा है
बादल की.......................
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