Tuesday, December 27, 2016

परछाई

कल चाँद आया था क़ैफ़ियत* पूछने
तुम्हारे जाने का अंदाज़ा
हो गया था उसे
मेरी मायूसी देखकर
शायद
और
जवाब देने को मैंने
जैसे ही उठाई
नज़रें अपनी
लौट गया वो
जल कर मानो
बिना सुने ही

मेरी आँखों में
तुम्हारा चेहरा दीखता है क्या ?

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क़ैफ़ियत* = हाल



2 comments:

  1. बहुत खूब विभू, इससे पहले भी तुम अच्छा लिखते थे, मगर ये कमाल का है।

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