Friday, December 9, 2016

ग़ज़ल

सब कुछ लगता मुब्हम* सा है
तेरे जाने का ग़म सा है

जो मुमकिन हो तो रह जाओ
जाना तेरा मातम सा है

बस दुश्वारी दिखती इसमें
पथ तेरे बिन दुर्गम* सा है

जाने से तेरे इस घर का
हर एक कोना बरहम* सा है

हो फुरसत तो मुड़कर देखो
दश्तो आलम* पुरनम* सा है

ये जीवन तेरे बिन गोया
कुछ आधा है कुछ कम सा है


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१. मुब्हम           - अस्पष्ट
२. दुर्गम            -  दुस्तर, विकट
३. बरहम          -  अस्त-व्यस्त
४. दश्तो आलम - दुनिया, संसार
५. पुरनम          -  गीला, भीगा


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