दिखता कोई राहबर तो नहीं
तन्हा मगर ये सफ़र तो नहीं
इतना असर चोट का क्यूँ हुआ
बाज़ू था मेरा वो सर तो नहीं
आते ही सब कुछ डुबा ले गई
थी तेज़ इतनी लहर तो नहीं
दिन में सियाही है क्यूँ राह में
है बंद ये रहगुज़र तो नहीं
आँखों में आँसू हैं दिखने लगे
मरहम तेरा बेअसर तो नहीं
मुझको पता कौन क़ातिल मिरा
नादान हूं बेख़बर तो नहीं
No comments:
Post a Comment