Tuesday, September 10, 2024

नई उम्मीद लेकर...

नई उम्मीद लेकर, फिर निकल रहा था मैं

कदम तो डगमगाए, पर सम्भल रहा था मैं

कैसी ये राह जिसमें, अनगिन चुनौतियां थी

मन में हौसला था, बस और चल रहा था मैं


                    हाथों में हाथ थामे, साथ चल रहा था जब

                    हसीन स्वप्न मेरे, मन में पल रहा था जब

                    एक आंधी आई सहसा, सब कुछ बिखर गया था

                    होश में नहीं था, मौसम बदल रहा था जब


वो साथ मेरे चलकर, अब तो थक गया होगा

हालात भी थे ऐसे, कि वो ठिठक गया होगा

मैं जानता हूं लेकिन, वो चाहता था आना

मोड़ पर कोई वो, रस्ता भटक गया होगा


                    सूनी वो राह है अब, जिसपे चल रहा हूं मैं

                    मिथ्या ये खोज है पर, मन को छल रहा हूं मैं

                    जिस वक्त था ठहराना, उस वक्त मुड़ गया वो

                    दीप हसरतों का, आशा से जल रहा हूं मैं

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