ज़ख्म कुछ ऐसे भी हैं जो वक़्त न भर पाएगा
पर उसका क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा ##
हर पल में दम तोड़ते मुहब्बत का क्या करें
हुस्न तो फिर भी सजाने से संवर जाएगा
ज़र्द पड़ चुके पत्तों की अब क़िस्मत कैसे संवरेगी
वो तो गुल है सुबह रौशनी से निखर जाएगा
उस दिल का क्या करें, जिसे तुझसे उम्मीद थी
अक्ल जानती थी तू इक रोज़ मुकर जाएगा
सुबह के भूले तो शाम को घर लौट गए
जिसका न हो आशियाँ, वो बोलो किधर जाएगा
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## अहमद फ़राज़ साहब का इक शेर है,
"आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा ,
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा"
"आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा ,
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा"
bahut khub...
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