Friday, September 30, 2011

नाला-ए-दिल*


जिक्र-ए-खयालात का मौका तो दिया होता
यूँ भी क्या था जाना इत्तला* तो किया होता 

 हम भी समंदर की वो गहराई माप लेते 
आँखों में अपने खोने का मौका जो दिया होता 

हम जीस्त* काट लेते उस ख़याल के सहारे 
मिलने का कभी तुमने वादा तो किया होता 

बदनाम हम न होते,कुचों* में नुक्कड़ों पर 
गर बज़्म* में तुमने हमें रुसवा* न किया होता 

दीवान दर्द-ओ-ग़म का मुक़म्मल* न होने पाता
गर कर गिरफ़्त इश्क में धोखा न दिया होता  

........................................................................................
नाला-ए-दिल - ह्रदय से निकलने वाला आर्तनाद  
इत्तला - सूचना
जीस्त - ज़िन्दगी 
कुचों -  गलिओं 
बज़्म - महफ़िल 
रुसवा - अपमानित 
मुक़म्मल - पूरा 

1 comment:

  1. bhaut khoobsurat dhang se tumne bichhadne ke dard ko bayaan kiya hai...

    ReplyDelete