Tuesday, September 27, 2011

गुज़रा ज़माना

 वो दिन थे जब रोज़ होती थी मुलाकातें
अब नज़रों का मिलना भी इत्तफ़ाक लगता है 

इक वक़्त था जब शफ़क* से मोहब्बत थी मुझको
अब सूरज का उगना भी मज़ाक लगता है  

किसी ज़माने में खुशियों की चाहत थी मुझको
अब मसर्रत* से खूबसूरत अज़ाब* लगता है 

कभी तसव्वुर* से भी जिसके सुकून मिलता था 
अब ख्याल-ए-वस्ल* भी उदास लगता है 

जंग-ए-मोहब्बत में गर नाकाम हो गए
तब ज़िन्दगी बस दर्द का हिसाब लगता है 

.......................................................................................
शफ़क - सवेरे या शाम की लालिमा जी क्षितिज पे होती है 
मसर्रत - ख़ुशी,आनंद  
अज़ाब - दुःख,कष्ट  
तसव्वुर -  ख्याल 
ख्याल-ए-वस्ल - मिलने का विचार 



   

2 comments:

  1. bohot din taq pathak ke mann ko ashant rakhhegi......

    ReplyDelete
  2. kya baat hai, phir se tumne apne shabdon se dil ko bechain kar diya...

    ReplyDelete