वो दिन थे जब रोज़ होती थी मुलाकातें
अब नज़रों का मिलना भी इत्तफ़ाक लगता है
इक वक़्त था जब शफ़क* से मोहब्बत थी मुझको
अब सूरज का उगना भी मज़ाक लगता है
किसी ज़माने में खुशियों की चाहत थी मुझको
अब मसर्रत* से खूबसूरत अज़ाब* लगता है
कभी तसव्वुर* से भी जिसके सुकून मिलता था
अब ख्याल-ए-वस्ल* भी उदास लगता है
जंग-ए-मोहब्बत में गर नाकाम हो गए
तब ज़िन्दगी बस दर्द का हिसाब लगता है
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शफ़क - सवेरे या शाम की लालिमा जी क्षितिज पे होती है
मसर्रत - ख़ुशी,आनंद
अज़ाब - दुःख,कष्ट
तसव्वुर - ख्याल
ख्याल-ए-वस्ल - मिलने का विचार
bohot din taq pathak ke mann ko ashant rakhhegi......
ReplyDeletekya baat hai, phir se tumne apne shabdon se dil ko bechain kar diya...
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