Sunday, November 28, 2010

तन्हाई के आलम में कभी-कभी

तन्हाई के आलम में कभी-कभी,
तन्हाई के मसान* शून्यता से एक नासमझ प्रश्न पूछता हूँ,
कि क्या मेरे जीवन में प्रकाश का कोई योग है?
उत्तर ना पाकर आह्लादित* हो उठता हूँ,
ऐसे,
मानो यह निरुत्तरता हाँ छुपाये बैठा हो,
शायद,इसलिए क्यूँ कि मेरे जीवन में
ख़ुशी का अन्य कोई श्रोत नहीं

यूं तो मेरी ज़िन्दगी पथराई हुई,
बिन बुझी चराग कि रौशनी के समान है
जिसे ना तो जीवन के आनंद का एहसास है
ना ही मृत्यु के शुकून का
बस एहसास है तो आच्छादित* तन्हाई के सघनता का
जिसे प्रतिस्थापित* करने वाला भी है तो बस
तन्हाई...

अब मेरी दिनचर्या है,
खामोशी की सदाओं को सुनना
महसूस करना
और उसी से खेलते हुए तन्हाई के आगोश में खो जाना

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मसान -- श्मसान , मरघट
आह्लादित -- अत्यधिक प्रसन्न
आच्छादित -- फैला हुआ
प्रतिस्थापित --  स्थान लेना

2 comments:

  1. "यूं तो मेरी ज़िन्दगी पथराई हुई,
    बिन बुझी चराग के रौशनी के समान है
    जिसे ना तो जीवन के आनंद का एहसास है
    ना ही मृत्यु के शुकून का"
    .
    अद्भुत निरीक्षण....एक सुन्दर काव्य या यों कहें कि यह किसी भी विधा से परे है.
    अकेलापन किसी को इस हद तक सालता है कि उसके पास निरुत्तरता में भी हाँ देखने के सिवा कोई अन्य उपाय नहीं.

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  2. anderon me sayad rosni ki chingari hai..... chirag banke jale hai dil.... aur ujale kie anjuman.....aaapke kabita ye sikhaye hume....

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