ना जाने हर मोड़ पे क्यूँ खुद को मैंने पीछे पाया,
या मैंने ही शायद अपनी क्षमता से कम जोड़ लगाया
ना जाने किस्मत में किसने बीज निराशा रोप दिया,
या मैंने की शायद जीवन भाग्य के हाथों सौंप दिया
ना जाने मेरे जीवन से खुशियों ने क्यूँ गमन किया,
या मैंने ही शायद अपनी खुशियों का है दमन* किया
ना जाने क्यूँ तम* ने ही हर बार ज्योति पर चढ़ाई की,
या मैंने ही शायद अंधेरों की खुलकर बड़ाई की
ना जाने क्यूँ मंजिल ने यह आँख-मिचोली खेल किया,
या मैंने ही शायद मंजिल के चुनाव में भूल किया
अब एक प्रश्न ईश्वर से मैं करने की इच्छा रखता हूँ,
थी यह उनकी ही इच्छा या सच मे मैंने भूल किया
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दमन -- दबाना
तम -- अँधेरा
goood ,,,,,my best wishes are wid u....u will go a long way...
ReplyDeleteयह परिश्थिति तब आती है जब हम या तो ख़ुद से ज्यादा अपेक्षाएं कर लेते हैं अथवा अपनी अपेक्षाओं पे किसी भी कारणों से खड़े नहीं उतर पाते....अंतरात्मा को दिए गए वचन के अवलोकन पर (असफलता, यद्यपि ये कुछ अधिक क्रूर शब्द है,इसीलिए कुछ और सोचता हूँ ) किसी भी तरह के त्रुटी के पाए जाने के उपरांत स्वस्थिति का सुन्दर चित्रण...
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