Sunday, November 9, 2025

आसमां पिघल गया

आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा बदल गई

आंख मेरी जब खुली तो स्वप्न चूर चूर था
एक तरफ थी मिन्नतें तो एक तरफ ग़ुरूर था
धीरे-धीरे करके आस रेत सी फिसल गई
हौसलों की आग अब तो राख में बदल गई
रात के ही बाद देखो रात फिर से ढल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा...................

मैं ये सोचता रहा नसीब अपना लिख रहा
और ख़ुद ही मैं कथा के नायकों को चुन रहा
मुझको भ्रम रहा कि मेरे हाथ में ही डोर था
सत्य तो मगर किसी पहाड़ सा कठोर था
इस मुग़ालते में देखो ज़िंदगी निकल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा...................

क्या बताऊँ मेरे साथ कैसा हादसा हुआ
घुट चुके थे फूल सारे जब चमन मेरा हुआ
क्या बचा था अब जो मैं बहार को पुकारता
कौन है मेरा यहाँ जो ज़िंदगी संवारता
चांदनी ही देखो मेरे सूर्य को निगल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा ...................

Monday, June 23, 2025

ग़ज़ल

दिखता कोई राहबर तो नहीं
तन्हा मगर ये सफ़र तो नहीं

इतना असर चोट का क्यूँ हुआ
बाज़ू था मेरा वो सर तो नहीं

आते ही सब कुछ डुबा ले गई
थी तेज़ इतनी लहर तो नहीं

दिन में सियाही है क्यूँ राह में
है बंद ये रहगुज़र तो नहीं

आँखों में आँसू हैं दिखने लगे
मरहम तेरा बेअसर तो नहीं

मुझको पता कौन क़ातिल मिरा 
नादान हूं बेख़बर तो नहीं