Friday, August 30, 2013

जब से सपना विस्तार हुआ

जब से सपना विस्तार हुआ
मानो जीवन बेकार हुआ

छोटा मकान था बेहतर था
क्यूँ विस्तृत पारावार* हुआ

सपनों की दुनिया जगमग थी
क्यूँ सच का निष्ठुर वार हुआ

मेरे इस शांत नशेमन* में
क्यूँ हलचल बारम्बार हुआ

न कुछ पा जीवन सुखमय था
सब पा जीवन निस्सार* हुआ



.........................................
पारावार* -  सीमा, हद
नशेमन*  -  विश्राम करने का एकांत स्थल
निस्सार* - जिसमें कोई रोचक तत्व न हो

5 comments:

  1. bahut hi achha hai......keep writing...lekin thoda viidhata ko v apne andar samahit karne ki koshsish karo
    ..

    ReplyDelete
    Replies
    1. Pehle to shukriya kahunga aur fir aapse guzarish karunga ki zara spast karein apne cmnt ko...main "vidhata ko samahit" karne waala prasang nahin samajh saka...

      Delete
  2. hmmmmmmmmmmmm..................introvert

    ReplyDelete