Saturday, August 24, 2013

मुझे नहीं पहचान सका है

मुझे नहीं पहचान सका है

जब तक मन था गले लगाया
                दिन विपरीत हुआ ठुकराया
मेरे अन्तर की अथाह प्रियता* को पर न छान सका है
                                         मुझे नहीं पहचान सका है


प्रणय* गीत मुझको सिखलाया
                हँसकर मेरा मन बहलाया
मेरे अन्तर की चोटिल पीड़ा को पर न जान सका है
                                     मुझे नहीं पहचान सका है


सघन धुंध और कोहरा छाया
                पल-पल मेरा जी घबराया
इस विपरीत घड़ी में अपना मुझे न कोई मान सका सका है
                                                मुझे नहीं पहचान सका है



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प्रियता* - प्रेम का भाव
प्रणय*   - प्रेम 

6 comments:

  1. बहुत अच्छी है. मुझे कवि "अशांत" की याद आती है. छंद में कविताएँ नहीं मिलती आजकल. एक बेहद सफल प्रयास.

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  2. @Mayank...बहुत-२ धन्यवाद !!

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  3. @aditya bhushan mishra...kavi ashant ko padh kar bohot prerit hua to man hua ki usi chhand mein kuch likha jai...

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  4. बहुत सुंदर। :)

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