Friday, October 7, 2011

उलझन के दिन बीत रहे हैं

उलझन के दिन बीत रहे हैं
दिन उलझन में बीत रहे हैं

                  एक पल में मैं आशावादी
                  अगले पलक निराशावादी ,
                  एक पल जो मानूं ऊंचाई
                  अगले क्षण वो गहरी खाई
कोरी आशा , मृगतृष्णा के
निष्ठुर दिन वे धूर्त रहे हैं
दिन उलझन में........
                 
                    एक पल को मैं हार से डरता
                    अगले क्षण प्रतिकार हूँ करता ,
                    एक पल कोई लगता प्यारा
                    अगले पल न रहे हमारा
कभी जटिलता,कभी कठिनता
दिन ये बड़े अविनीत* रहे हैं
दिन उलझन में......

                     एक पल लक्ष्य है अपना लगता
                     अगले क्षण सब सपना लगता ,
                     एक पल को लगता है सवेरा
                     अगले क्षण बस घोर अँधेरा
साक्षी इस दुविधा के मेरे
कई छंद ओ गीत रहे हैं
दिन उलझन में........


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अविनीत - निष्ठुर,निर्दयी


                 

5 comments:

  1. मैं अमूमन आपके कविताओं के निर्माण का साक्षी रहा हूँ, इसी वजह से कई बार अपने विचार इस माध्यम से न रख सामने ही रख देता हूँ, पर इस बार कुछ भिन्न हुआ, न मैं कविता निर्माण के वक़्त था और न ही ये एक ऐसी कविता रही जिसपर चाह कर भी अपनी अभिव्यक्ति रोकी जा सके.
    मैं आपको साधुवाद देता हूँ और बस इतना ही लिखूंगा की लेखनी आज आप पर गौरवान्वित हो रही होगी.....

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  2. in palon ko kalam ke syaahe se kaid karna bahut badi kshamta darsaati hai... prasanshniya...

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  3. jeevan ka ye tathyatmak varnan bejor hai...........umda rachna!!!!

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  4. जीवन का ये तथ्यात्मक वर्णन काफी सुन्दर और सटीक है................एक उम्दा रचना!!!!!

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