Tuesday, June 28, 2011

ग़ज़ल

यूं तो हर इक लब पे हँसी की लिबास है,
वरना ये कायनात कितनी गमशानस* है

सजदे में सर झुके ये मरासिम* की बात है,
इंसान को कहाँ वगरना इम्तिआज़* है

लोग कहते हैं कि उल्फत जीस्त* है लेकिन,
मिलता यहाँ पे ज्यादा गम-ए-इफतिराक* है

एहसास उनको हो भले ही जी रहे हैं पर,
इंसान अब इक चीखता,चिल्लाता लाश है 

इन्सान ही कहलाता हर इक आदमी मगर,
इंसानियत तो गुजरे ज़माने कि बात है

राह हम पकड़े भले भलाई की मगर,
अब बुराई पर कहाँ उठता सवाल है 
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गमशानस= गम पहचानने वाला
मरासिम= रस्म का बहुवचन 
इम्तिआज़=तमीज़ करना
जीस्त= जीवन 
गम-ए-इफतिराक= जुदाई का गम 

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