चाँद और तारे चमकते हैं गगन में
दीप्ति* रथ पर सूर्य भी चलता मगन में
पर न इस तक नूर का कतरा पहुँचता
देह है झुलसा हुआ जबकि अगन में
मध्य में अदृश्य कुछ दीवार सा है
सर पे इसके क़र्ज़ का एक भार सा है
त्यौहार की सुन्दर घड़ी आई हुई है
और चारों ओर हरियाली हुई है
वंचित रहा है इस से भी पर वह अभी तक
नियति* उसकी आज शर्मायी हुई है
यातनाओं के भंवर के मध्य उसका
अब उपेक्षित बना एक संसार सा है
कब तक मगर वह इस तरह जीता रहेगा
जहर जो जग से मिला पीता रहेगा
उसकी सजा की भी कोई सीमा तो होगी
या यूँ ही हालात से लड़ता रहेगा
श्रम से मगर सम्मान पा लेगा ही एक दिन
पलता ह्रदय में एक यह विश्वास सा है
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ग़ुरबत - गरीबी
दीप्ति - प्रकाश
नियति - भाग्य
बहुत खूब . मन प्रफुल्लित हो गया. हर एक लाइन में कुछ अलग और कुछ गंभीर बातें . वाह !
ReplyDeleteधन्यवाद...
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