Monday, December 13, 2010

आशंकित मन

कोई बेगाना शहर,
एक अनजान सड़क,
और एक लड़का,जो खड़ा है तन्हा
कुछ टूटा,कुछ अलग-थलग
होकर अपनों से दूर,हो हालातों से मजबूर
किसी वह दूर गाँव से आया है...

और यहाँ जब देखा तो,
है लोगों की भीड़ लगी,
दुर्घटना भी है कदम कदम,
इक असहनीय कोलाहल है जो कानों को है बेध रहा,
उसपर से लोगों का जीवन जिसने बदली है परिभाषा

अब है वह कुछ घबराया सा,
कुछ डरा हुआ सा,सहमा सा,
आश्चर्यचकित,
और न जाने कितने भावों को
लिए समेटे खड़ा है वह तन्हा लड़का
मानो जैसे इक मेले में बिछड़ा हो कोई छोटा बच्चा

गो*, है मालूम उसे कैसे
इस भीड़ में बचकर चलना है,
और इस कोलाहल में कैसे
हर कदम फूंककर रखना है,
पर फिर भी यह आशंका है,
जीवन के नव परिभाषा में
और कुछ बनने की आशा में,
अस्तित्व लड़ाई में न कहीं
वह खो बैठे नैसर्गिकता*

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गो -- यद्यपि
नैसर्गिक --  स्वाभाविक

3 comments:

  1. tanhai me apne aapse pahchan to har koi karpaye....vir me kudko pahchanne me hi khasiyat hai...hai na....?" us may se nahin matalab dil jisase ho begaana "...

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  2. dil ki agar jubaan hoti to wo tumse bolna sikhta....

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  3. "गो,है मालूम उसे कैसे
    इस भीड़ में बचकर चलना है,"
    .
    आपने "इस भीड़ "से" बचकर" चलने की बात न कर , "इस भीड़ "में" बचकर चलने" की बात की , यह पंक्ति दिखलाता है की आप व्यवहारिक सोचते हैं और यह एक बहुत ही अच्छी बात है क्यूंकि फिर आप इस समाज को ज्यादा करीब से देख पाएंगे और पाठक भी ज्यादा लगाव महसूस करेंगे,
    साधुवाद, प्रयास जरी रखें

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