Monday, June 23, 2025
ग़ज़ल
Tuesday, September 10, 2024
नई उम्मीद लेकर...
नई उम्मीद लेकर, फिर निकल रहा था मैं
कदम तो डगमगाए, पर सम्भल रहा था मैं
कैसी ये राह जिसमें, अनगिन चुनौतियां थी
मन में हौसला था, बस और चल रहा था मैं
हाथों में हाथ थामे, साथ चल रहा था जब
हसीन स्वप्न मेरे, मन में पल रहा था जब
एक आंधी आई सहसा, सब कुछ बिखर गया था
होश में नहीं था, मौसम बदल रहा था जब
वो साथ मेरे चलकर, अब तो थक गया होगा
हालात भी थे ऐसे, कि वो ठिठक गया होगा
मैं जानता हूं लेकिन, वो चाहता था आना
मोड़ पर कोई वो, रस्ता भटक गया होगा
सूनी वो राह है अब, जिसपे चल रहा हूं मैं
मिथ्या ये खोज है पर, मन को छल रहा हूं मैं
जिस वक्त था ठहराना, उस वक्त मुड़ गया वो
दीप हसरतों का, आशा से जल रहा हूं मैं
Friday, January 12, 2024
जीवन-३
Friday, March 31, 2023
जीवन-२
नहीं समझ आता है मुझको
क्या है जीवन, क्यूँ है जीवन
अब तक जो मैं करता आया
रहा नियंत्रण उसपे मेरा
या सब पहले से ही तय था
किधर अँधेरा, किधर सवेरा
कैसे उजाले आ जाते हैं
अन्धकार फिर छा जाता है
नहीं समझ.......................
किस जानिब से ख़ुशियाँ आती
किधर से चलकर दुःख आता है
क्यूँ ये बहारें आ जाती हैं
क्यूँ फिर पतझर छा जाता है
जब-जब लगता सुलझ रहा है
तब-तब और है उलझा जीवन
नहीं समझ...........................
कभी-कभी लगता है ये भी
जिसने जो बोया वो पाया
अगले क्षण पर नज़र पड़ी तो
सड़क पे रोता बच्चा पाया
जब लगता अब दीख रहा है
उसी समय धुंधलाया दर्पण
नहीं समझ.......................
बहुत देर तक बैठे सोचा
किस यात्रा पर निकले हैं हम
कहाँ है जाना, किधर से जाना
क्या है प्रयोजन निकले हैं हम
लगातार जब चलते-चलते
एक दिन सब कुछ रुक जाना है
नहीं समझ...........................
Tuesday, May 18, 2021
अमावस
Thursday, October 29, 2020
कब तक दिया जलाए रक्खूँ
कब तक दिया जलाए रक्खूँ
डीमो भी कुछ समझ न आई
आँखें मूंदे कब तक लेकिन
मन में आस लगाए रक्खूँ
कब तक........................
रोज़गार का वही हाल है
जीडीपी लेटा निढाल है
अच्छे दिन के सपने को मैं
कब तक यूँही जगाए रक्खूँ
कब तक........................
दंगे अब तो आम बात हैं
जबरन होते बिल भी पास हैं
अपने मन को कब तक लेकिन
*मृगजल में उलझाए रक्खूँ
कब तक........................
सभी *सूचकों में हम फिसले
कोरोना में आगे निकले
कोरी कल्पित दुनिया को मैं
कब तक यूँही सजाए रक्खूँ
कब तक........................
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*मृगजल = मृगतृष्णा, भ्रम
*सूचक = Index
Thursday, September 3, 2020
सपनों से सुन्दर अपना दर्पण
सूरज के ऊपर किसने ये, काली चादर डाली
अभिलाषा थी देखूँगा मैं, प्रात-काल की लाली
सूर्य-किरण से आलोकित फिर, कब जन-जीवन होगा
सोचा था सपनों से सुन्दर.....................
अम्बर के सज्जा आभूषण, किसने हाय उतारे
सूने नभ को कब तक देखूँ, बिन चंदा बिन तारे
*चंद्र-तारिकाओं से जगमग, कब गगनांगन होगा
सोचा था सपनों से सुन्दर.....................
उपवन के अंतस में जाने, किसने आग लगाई
मुरझाई वल्लरियाँ ऐसी, कभी कुसुम ना आई
पुष्प-सुमन से सज्जित शोभित, फिर कब उपवन होगा
सोचा था सपनों से सुन्दर.....................
