Sunday, July 19, 2026

जीवन-४


अब जीवन यात्रा से जैसे, ऊब गया मन मेरा
मेरी निशा में जबकि है शशि, व दिनकर से सवेरा
फिर भी जीवन निर्जन ख़ाली रिक्त मुझे लगता है
जीवन जीना मुझको कोई कार्य सदृश लगता है

शिशिर ऋतु के बाद है आती, अब भी नई बहारें
जलती तपती भूमि पे अब भी, बारिश की बौछारें
अब वसंत में बारिश में पर गीत की ध्वनि नहीं है
शिथिल हृदय को पुनः जगा दे ऐसी अग्नि नहीं है

कोई खोज नहीं है जीवित, अब मेरी आँखों में
कोई चाह नहीं है शामिल, अब मेरी बातों में
इच्छाओं से सिंचित जीवन ही सजीव लगता है
जीवन बिन इच्छा के निर्बल मरणासन्न दिखता है

अब तक चलता रहा निरंतर, चलना थी मजबूरी
जीवन तो गतिमान हमेशा, परिभाषा थी मेरी
जीवन के क्रम में रुकने की अनुमति कहाँ किसी को
चलते रहने की है अब तो आदत पड़ी सभी को 

अकस्मात जब एक दिन ठहरा, चिंतन में ये आया 
जीवन का क्या मतलब जब हो, वांछित धूप न छाया
चिंतन के पश्चात अपेक्षित था कुछ हल निकलेगा
युगों से संचित जिज्ञासा का भी निष्कर्ष मिलेगा

मौन प्रश्न पर जीवन से क्यूं, ऊब गया मन मेरा
सोच-सोच कर अब तो ये है, डूब गया मन मेरा
इतना समझा अर्थपूर्ण ना अर्थहीन है जीवन
जैसा चाहो इसको देखो वैसा दिखता जीवन

Sunday, March 15, 2026

जिस समय ये लगे

जिस समय ये लगे तुमसे सब छिन रहा
जिस समय ये लगे जाने क्या हो रहा
उस समय पास तेरे कोई आएगा
उसको ईश्वर कहो या करिश्मा कहो
ख़्वाब तुमको वो फिर से दिखा जाएगा
जिस समय ये लगे..................

तुमको लगने लगे जब कि सब व्यर्थ है
इस विवश ज़िंदगी का भी क्या अर्थ है
उस समय तेरा मन कोई सहलाएगा
उसको रहबर कहो, या मसीहा कहो
हसरतों का दिया फिर जला जाएगा
जिस समय ये लगे..................

जब धरा पर लगे बस कि अन्याय है
और हस्ती ये दुख का ही पर्याय है
उस समय हाथ देने कोई आएगा 
उसको क़ुदरत कहो, या ख़ुदाई कहो
मन में उम्मीद फिर से जगा जाएगा
जिस समय ये लगे..................

हम तो जीवन ये भ्रम में ही जी सकते हैं
ख़्वाब, हसरत, उम्मीदों पे पल सकते हैं
नीर आंखों से वरना छलक आएगा
आस न हो तो सच इस कदर क्रूर है
ऐसे जीवन नहीं फिर जिया जाएगा 
जिस समय ये लगे..................