Saturday, September 26, 2026

सोचेंगे तुम्हें वोट

सोचेंगे तुम्हें वोट, करें कि नहीं 

कि अबसे सपोट, करें कि नहीं

चौदह में था लाया तुमको, फिरसे था जिताया तुमको

हमारी मगर क्यूं कोई, कदर ही नहीं

सोचेंगे तुम्हें वोट करें कि नहीं

कि अबसे सपोट.....................


तुम आए थे सपने थे जगे

अच्छे दिन के वादे थे किए

वापस होगा काला धन, किसान का दुगना इनकम 

सबका पक्का घर होगा, अब स्मार्ट शहर होगा

वादे हैं तोड़े तुमने, ओ बेरहम, ओ बेरहम

सोचेंगे तुम्हें वोट करें कि नहीं

कि अबसे सपोट.....................


तुमने आते "डीमो" ला दिया

ईडी दम पर क्या क्या ना किया

आरटीआई तड़प रहा, डेटा अब निजी ना रहा

पर्यावरण कानून दफ़न, लाए कितने संशोधन

सीना है चौड़ा कितना, दिल पर है कम, दिल पर है कम

सोचेंगे तुम्हें वोट करें कि नहीं

कि अबसे सपोट

.....................

Saturday, August 8, 2026

हद से गुज़र जाना है

धीरे-धीरे लूट के कमाना है, 

हद से गुज़र जाना है 

अब तो देश बेच खाना है, 

हद से गुज़र जाना है


तेल ईथेनल होगा, दाम पर डबल होगा

गाड़ियां परेशाँ हो हो के हैं खड़ी

ऐ क्यूं आई बढ़ जाए, पेड़ सारे कट जाएं,

फैल जाए ज़हर यहाँ, किसको है पड़ी

सब कुछ गर्त में मिलाना है

हद से गुज़र..................


रोज़गार कम होगा, भ्रष्ट्र तंत्र अब होगा

हो चरम पे महंगाई, किसको है फिकर 

स्कूल बंद हो जाएं, प्रश्न लीक हो जाएं 

मीडिया हो साथ तो बनती नहीं ख़बर 

शासन ऐसे ही चलाना है

हद से गुज़र..................


पहले भी तो ऐसा था, बेईमान सारे थे

कोशिशें छुपाने की, करते थे मगर

अब विरोध हो जाए, लोग त्रस्त हो जाएं 

सीना तान कर खड़े हैं, शर्म है न डर

कैसा आ गया ज़माना है

हद से गुज़र..................

Sunday, July 19, 2026

जीवन-४


अब जीवन यात्रा से जैसे, ऊब गया मन मेरा
मेरी निशा में जबकि है शशि, व दिनकर से सवेरा
फिर भी जीवन निर्जन ख़ाली रिक्त मुझे लगता है
जीवन जीना मुझको कोई कार्य सदृश लगता है

शिशिर ऋतु के बाद है आती, अब भी नई बहारें
जलती तपती भूमि पे अब भी, बारिश की बौछारें
अब वसंत में बारिश में पर गीत की ध्वनि नहीं है
शिथिल हृदय को पुनः जगा दे ऐसी अग्नि नहीं है

कोई खोज नहीं है जीवित, अब मेरी आँखों में
कोई चाह नहीं है शामिल, अब मेरी बातों में
इच्छाओं से सिंचित जीवन ही सजीव लगता है
जीवन बिन इच्छा के निर्बल मरणासन्न दिखता है

अब तक चलता रहा निरंतर, चलना थी मजबूरी
जीवन तो गतिमान हमेशा, परिभाषा थी मेरी
जीवन के क्रम में रुकने की अनुमति कहाँ किसी को
चलते रहने की है अब तो आदत पड़ी सभी को 

अकस्मात जब एक दिन ठहरा, चिंतन में ये आया 
जीवन का क्या मतलब जब हो, वांछित धूप न छाया
चिंतन के पश्चात अपेक्षित था कुछ हल निकलेगा
युगों से संचित जिज्ञासा का भी निष्कर्ष मिलेगा

मौन प्रश्न पर जीवन से क्यूं, ऊब गया मन मेरा
सोच-सोच कर अब तो ये है, डूब गया मन मेरा
इतना समझा अर्थपूर्ण ना अर्थहीन है जीवन
जैसा चाहो इसको देखो वैसा दिखता जीवन

Sunday, March 15, 2026

जिस समय ये लगे

जिस समय ये लगे तुमसे सब छिन रहा
जिस समय ये लगे जाने क्या हो रहा
उस समय पास तेरे कोई आएगा
उसको ईश्वर कहो या करिश्मा कहो
ख़्वाब तुमको वो फिर से दिखा जाएगा
जिस समय ये लगे..................

तुमको लगने लगे जब कि सब व्यर्थ है
इस विवश ज़िंदगी का भी क्या अर्थ है
उस समय तेरा मन कोई सहलाएगा
उसको रहबर कहो, या मसीहा कहो
हसरतों का दिया फिर जला जाएगा
जिस समय ये लगे..................

जब धरा पर लगे बस कि अन्याय है
और हस्ती ये दुख का ही पर्याय है
उस समय हाथ देने कोई आएगा 
उसको क़ुदरत कहो, या ख़ुदाई कहो
मन में उम्मीद फिर से जगा जाएगा
जिस समय ये लगे..................

हम तो जीवन ये भ्रम में ही जी सकते हैं
ख़्वाब, हसरत, उम्मीदों पे पल सकते हैं
नीर आंखों से वरना छलक आएगा
आस न हो तो सच इस कदर क्रूर है
ऐसे जीवन नहीं फिर जिया जाएगा 
जिस समय ये लगे..................

Sunday, November 9, 2025

आसमां पिघल गया

आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा बदल गई

आंख मेरी जब खुली तो स्वप्न चूर चूर था
एक तरफ थी मिन्नतें तो एक तरफ ग़ुरूर था
धीरे-धीरे करके आस रेत सी फिसल गई
हौसलों की आग अब तो राख में बदल गई
रात के ही बाद देखो रात फिर से ढल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा...................

मैं ये सोचता रहा नसीब अपना लिख रहा
और ख़ुद ही मैं कथा के नायकों को चुन रहा
मुझको भ्रम रहा कि मेरे हाथ में ही डोर था
सत्य तो मगर किसी पहाड़ सा कठोर था
इस मुग़ालते में देखो ज़िंदगी निकल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा...................

क्या बताऊँ मेरे साथ कैसा हादसा हुआ
घुट चुके थे फूल सारे जब चमन मेरा हुआ
क्या बचा था अब जो मैं बहार को पुकारता
कौन है मेरा यहाँ जो ज़िंदगी संवारता
चांदनी ही देखो मेरे सूर्य को निगल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा ...................

Monday, June 23, 2025

ग़ज़ल

दिखता कोई राहबर तो नहीं
तन्हा मगर ये सफ़र तो नहीं

इतना असर चोट का क्यूँ हुआ
बाज़ू था मेरा वो सर तो नहीं

आते ही सब कुछ डुबा ले गई
थी तेज़ इतनी लहर तो नहीं

दिन में सियाही है क्यूँ राह में
है बंद ये रहगुज़र तो नहीं

आँखों में आँसू हैं दिखने लगे
मरहम तेरा बेअसर तो नहीं

मुझको पता कौन क़ातिल मिरा 
नादान हूं बेख़बर तो नहीं


Tuesday, September 10, 2024

नई उम्मीद लेकर...

नई उम्मीद लेकर, फिर निकल रहा था मैं

कदम तो डगमगाए, पर सम्भल रहा था मैं

कैसी ये राह जिसमें, अनगिन चुनौतियां थी

मन में हौसला था, बस और चल रहा था मैं


                    हाथों में हाथ थामे, साथ चल रहा था जब

                    हसीन स्वप्न मेरे, मन में पल रहा था जब

                    एक आंधी आई सहसा, सब कुछ बिखर गया था

                    होश में नहीं था, मौसम बदल रहा था जब


वो साथ मेरे चलकर, अब तो थक गया होगा

हालात भी थे ऐसे, कि वो ठिठक गया होगा

मैं जानता हूं लेकिन, वो चाहता था आना

मोड़ पर कोई वो, रस्ता भटक गया होगा


                    सूनी वो राह है अब, जिसपे चल रहा हूं मैं

                    मिथ्या ये खोज है पर, मन को छल रहा हूं मैं

                    जिस वक्त था ठहराना, उस वक्त मुड़ गया वो

                    दीप हसरतों का, आशा से जल रहा हूं मैं