काव्यांजलि
Sunday, July 19, 2026
जीवन-४
Sunday, March 15, 2026
जिस समय ये लगे
तुमको लगने लगे जब कि सब व्यर्थ हैइस विवश ज़िंदगी का भी क्या अर्थ हैउस समय तेरा मन कोई सहलाएगाउसको रहबर कहो, या मसीहा कहोहसरतों का दिया फिर जला जाएगाजिस समय ये लगे..................
और हस्ती ये दुख का ही पर्याय है
उस समय हाथ देने कोई आएगा
उसको क़ुदरत कहो, या ख़ुदाई कहो
मन में उम्मीद फिर से जगा जाएगा
हम तो जीवन ये भ्रम में ही जी सकते हैंख़्वाब, हसरत, उम्मीदों पे पल सकते हैंनीर आंखों से वरना छलक आएगाआस न हो तो सच इस कदर क्रूर हैऐसे जीवन नहीं फिर जिया जाएगाजिस समय ये लगे..................
Sunday, November 9, 2025
आसमां पिघल गया
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा बदल गई
आंख मेरी जब खुली तो स्वप्न चूर चूर था
एक तरफ थी मिन्नतें तो एक तरफ ग़ुरूर था
धीरे-धीरे करके आस रेत सी फिसल गई
हौसलों की आग अब तो राख में बदल गई
रात के ही बाद देखो रात फिर से ढल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा...................
मैं ये सोचता रहा नसीब अपना लिख रहा
और ख़ुद ही मैं कथा के नायकों को चुन रहा
मुझको भ्रम रहा कि मेरे हाथ में ही डोर था
सत्य तो मगर किसी पहाड़ सा कठोर था
इस मुग़ालते में देखो ज़िंदगी निकल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा...................
क्या बताऊँ मेरे साथ कैसा हादसा हुआ
घुट चुके थे फूल सारे जब चमन मेरा हुआ
क्या बचा था अब जो मैं बहार को पुकारता
कौन है मेरा यहाँ जो ज़िंदगी संवारता
चांदनी ही देखो मेरे सूर्य को निगल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा ...................
Monday, June 23, 2025
ग़ज़ल
Tuesday, September 10, 2024
नई उम्मीद लेकर...
नई उम्मीद लेकर, फिर निकल रहा था मैं
कदम तो डगमगाए, पर सम्भल रहा था मैं
कैसी ये राह जिसमें, अनगिन चुनौतियां थी
मन में हौसला था, बस और चल रहा था मैं
हाथों में हाथ थामे, साथ चल रहा था जब
हसीन स्वप्न मेरे, मन में पल रहा था जब
एक आंधी आई सहसा, सब कुछ बिखर गया था
होश में नहीं था, मौसम बदल रहा था जब
वो साथ मेरे चलकर, अब तो थक गया होगा
हालात भी थे ऐसे, कि वो ठिठक गया होगा
मैं जानता हूं लेकिन, वो चाहता था आना
मोड़ पर कोई वो, रस्ता भटक गया होगा
सूनी वो राह है अब, जिसपे चल रहा हूं मैं
मिथ्या ये खोज है पर, मन को छल रहा हूं मैं
जिस वक्त था ठहराना, उस वक्त मुड़ गया वो
दीप हसरतों का, आशा से जल रहा हूं मैं
Friday, January 12, 2024
जीवन-३
Friday, March 31, 2023
जीवन-२
नहीं समझ आता है मुझको
क्या है जीवन, क्यूँ है जीवन
अब तक जो मैं करता आया
रहा नियंत्रण उसपे मेरा
या सब पहले से ही तय था
किधर अँधेरा, किधर सवेरा
कैसे उजाले आ जाते हैं
अन्धकार फिर छा जाता है
नहीं समझ.......................
किस जानिब से ख़ुशियाँ आती
किधर से चलकर दुःख आता है
क्यूँ ये बहारें आ जाती हैं
क्यूँ फिर पतझर छा जाता है
जब-जब लगता सुलझ रहा है
तब-तब और है उलझा जीवन
नहीं समझ...........................
कभी-कभी लगता है ये भी
जिसने जो बोया वो पाया
अगले क्षण पर नज़र पड़ी तो
सड़क पे रोता बच्चा पाया
जब लगता अब दीख रहा है
उसी समय धुंधलाया दर्पण
नहीं समझ.......................
बहुत देर तक बैठे सोचा
किस यात्रा पर निकले हैं हम
कहाँ है जाना, किधर से जाना
क्या है प्रयोजन निकले हैं हम
लगातार जब चलते-चलते
एक दिन सब कुछ रुक जाना है
नहीं समझ...........................