Sunday, March 15, 2026

जिस समय ये लगे

जिस समय ये लगे तुमसे सब छिन रहा
जिस समय ये लगे जाने क्या हो रहा
उस समय पास तेरे कोई आएगा
उसको ईश्वर कहो या करिश्मा कहो
ख़्वाब तुमको वो फिर से दिखा जाएगा
जिस समय ये लगे..................

तुमको लगने लगे जब कि सब व्यर्थ है
इस विवश ज़िंदगी का भी क्या अर्थ है
उस समय तेरा मन कोई सहलाएगा
उसको रहबर कहो, या मसीहा कहो
हसरतों का दिया फिर जला जाएगा
जिस समय ये लगे..................

जब धरा पर लगे बस कि अन्याय है
और हस्ती ये दुख का ही पर्याय है
उस समय हाथ देने कोई आएगा 
उसको क़ुदरत कहो, या ख़ुदाई कहो
मन में उम्मीद फिर से जगा जाएगा
जिस समय ये लगे..................

हम तो जीवन ये भ्रम में ही जी सकते हैं
ख़्वाब, हसरत, उम्मीदों पे पल सकते हैं
नीर आंखों से वरना छलक आएगा
आस न हो तो सच इस कदर क्रूर है
ऐसे जीवन नहीं फिर जिया जाएगा 
जिस समय ये लगे..................

Sunday, November 9, 2025

आसमां पिघल गया

आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा बदल गई

आंख मेरी जब खुली तो स्वप्न चूर चूर था
एक तरफ थी मिन्नतें तो एक तरफ ग़ुरूर था
धीरे-धीरे करके आस रेत सी फिसल गई
हौसलों की आग अब तो राख में बदल गई
रात के ही बाद देखो रात फिर से ढल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा...................

मैं ये सोचता रहा नसीब अपना लिख रहा
और ख़ुद ही मैं कथा के नायकों को चुन रहा
मुझको भ्रम रहा कि मेरे हाथ में ही डोर था
सत्य तो मगर किसी पहाड़ सा कठोर था
इस मुग़ालते में देखो ज़िंदगी निकल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा...................

क्या बताऊँ मेरे साथ कैसा हादसा हुआ
घुट चुके थे फूल सारे जब चमन मेरा हुआ
क्या बचा था अब जो मैं बहार को पुकारता
कौन है मेरा यहाँ जो ज़िंदगी संवारता
चांदनी ही देखो मेरे सूर्य को निगल गई
आसमां पिघल गया ज़मीन सारी जल गई
देखते ही देखते यहाँ फ़िज़ा ...................

Monday, June 23, 2025

ग़ज़ल

दिखता कोई राहबर तो नहीं
तन्हा मगर ये सफ़र तो नहीं

इतना असर चोट का क्यूँ हुआ
बाज़ू था मेरा वो सर तो नहीं

आते ही सब कुछ डुबा ले गई
थी तेज़ इतनी लहर तो नहीं

दिन में सियाही है क्यूँ राह में
है बंद ये रहगुज़र तो नहीं

आँखों में आँसू हैं दिखने लगे
मरहम तेरा बेअसर तो नहीं

मुझको पता कौन क़ातिल मिरा 
नादान हूं बेख़बर तो नहीं


Tuesday, September 10, 2024

नई उम्मीद लेकर...

नई उम्मीद लेकर, फिर निकल रहा था मैं

कदम तो डगमगाए, पर सम्भल रहा था मैं

कैसी ये राह जिसमें, अनगिन चुनौतियां थी

मन में हौसला था, बस और चल रहा था मैं


                    हाथों में हाथ थामे, साथ चल रहा था जब

                    हसीन स्वप्न मेरे, मन में पल रहा था जब

                    एक आंधी आई सहसा, सब कुछ बिखर गया था

                    होश में नहीं था, मौसम बदल रहा था जब


वो साथ मेरे चलकर, अब तो थक गया होगा

हालात भी थे ऐसे, कि वो ठिठक गया होगा

मैं जानता हूं लेकिन, वो चाहता था आना

मोड़ पर कोई वो, रस्ता भटक गया होगा


                    सूनी वो राह है अब, जिसपे चल रहा हूं मैं

                    मिथ्या ये खोज है पर, मन को छल रहा हूं मैं

                    जिस वक्त था ठहराना, उस वक्त मुड़ गया वो

                    दीप हसरतों का, आशा से जल रहा हूं मैं

Friday, January 12, 2024

जीवन-३

हरदम दिशा बदलता रहता 
सरिता जैसा बहता जीवन 


किसी समय लगता है आसां 
किसी समय लगता मुश्किल भी 
सफर निरंतर चलते जाना
मिलता इसका क्या साहिल भी
कभी सघन निर्जन वन लगता
कभी कुसुम सा खिलता जीवन
हरदम दिशा बदलता रहता 
सरिता जैसा.....................


                पत्थर, रोड़े, कंकड़ मिलते
                पथ को दुर्गम करने वाले
                पर आशाएँ भी राहों में
                नई रवानी भरने वाले 
                गिरते उठते चलते जाना
                चलता रहता है आजीवन
                हरदम दिशा बदलता रहता 
                सरिता जैसा.....................


तपती गर्मी, सूखा मौसम
जब प्रवाह को बाधित करता 
झम झम करती बारिश आकर
नव ऊर्जा संचारित करता 
गर्मी के पश्चात हमेशा
बारिश लेकर आता सावान
हरदम दिशा बदलता रहता 
सरिता जैसा.....................


                छोटे-छोटे कदम बढ़ाकर
                लंबी यात्रा पर चलता है
                मीठे-तीखे अनुभव चुनता 
                चट्टानों से भी लड़ता है
                सरिता जैसे सिंधु में मिलती 
                वैसे मृत्यु में मिलता जीवन
                हरदम दिशा बदलता रहता 
                सरिता जैसा.....................

Friday, March 31, 2023

जीवन-२

नहीं समझ आता है मुझको 

क्या है जीवन, क्यूँ है जीवन 


                 अब तक जो मैं करता आया 

                 रहा नियंत्रण उसपे मेरा 

                 या सब पहले से ही तय था 

                 किधर अँधेरा, किधर सवेरा 

                 कैसे उजाले आ जाते हैं 

                 अन्धकार फिर छा जाता है

                 नहीं समझ.......................


किस जानिब से ख़ुशियाँ आती 

किधर से चलकर दुःख आता है 

क्यूँ ये बहारें आ जाती हैं 

क्यूँ फिर पतझर छा जाता है 

जब-जब लगता सुलझ रहा है 

तब-तब और है उलझा जीवन 

नहीं समझ...........................


                  कभी-कभी लगता है ये भी 

                  जिसने जो बोया वो पाया

                  अगले क्षण पर नज़र पड़ी तो 

                  सड़क पे रोता बच्चा पाया 

                  जब लगता अब दीख रहा है 

                  उसी समय धुंधलाया दर्पण 

                  नहीं समझ.......................


बहुत देर तक बैठे सोचा 

किस यात्रा पर निकले हैं हम 

कहाँ है जाना, किधर से जाना 

क्या है प्रयोजन निकले हैं हम 

लगातार जब चलते-चलते 

एक दिन सब कुछ रुक जाना है 

नहीं समझ...........................


Tuesday, May 18, 2021

अमावस



इस समय का अंत भी निश्चय लिखा है 
बस इसी आशा पे चलता जा रहा हूँ। 


                        अब गगन बस *तारिकाएँ ही सजाता
                        इस अमावस का तिमिर गहरा रहा है, 
                        कृष्णपक्षी चाँद तम के उस तरफ से 
                        सबको अपनी वेदना बतला रहा है, 
                        पूर्णमासी चाँद लगता स्वप्न सा है, 
                        इस घड़ी मैं भी तनिक घबरा रहा हूँ, 
                        इस समय का अंत भी निश्चय लिखा है 
                        बस इसी आशा पे चलता जा रहा हूँ। 


अब बना जीवन मरण पर्यायवाची 
*यंत्रणा में लोग चिल्लाने लगे हैं,
इस तरह पसरा है पथ पर ग़म-उदासी 
अब सफ़र में लोग उकताने लगे हैं, 
*सिंधु के उस पार जाने क्या छिपा है, 
सोच कर उद्विग्न होता जा रहा हूँ,
इस समय का अंत भी निश्चय लिखा है 
बस इसी आशा पे चलता जा रहा हूँ। 


                          निर्दयी ये विश्वव्यापी ज्वार जिसने 
                          एक झटके में लिए हैं प्राण अनगिन, 
                          नभ में तारे उनके होने का दिलासा 
                          हमसे इस तूफान में जो हैं गए छिन,
                          ज़िन्दगी स्तब्ध, सब आशाएँ मूर्छित, 
                          कंठ में स्वर ज़ब्त लेकिन गा रहा हूँ, 
                          इस समय का अंत भी निश्चय लिखा है 
                          बस इसी आशा पे चलता जा रहा हूँ। 


.........................................................................................

१. तारिकाएँ = तारे 
२. यंत्रणा = दुःख, पीड़ा, कष्ट
३. सिंधु = समुद्र, सागर