धीरे-धीरे लूट के कमाना है,
हद से गुज़र जाना है
अब तो देश बेच खाना है,
हद से गुज़र जाना है
तेल ईथेनल होगा, दाम पर डबल होगा
गाड़ियां परेशाँ हो हो के हैं खड़ी
ऐ क्यूं आई बढ़ जाए, पेड़ सारे कट जाएं,
फैल जाए ज़हर यहाँ, किसको है पड़ी
सब कुछ गर्त में मिलाना है
हद से गुज़र..................
रोज़गार कम होगा, भ्रष्ट्र तंत्र अब होगा
हो चरम पे महंगाई, किसको है फिकर
स्कूल बंद हो जाएं, प्रश्न लीक हो जाएं
मीडिया हो साथ तो बनती नहीं ख़बर
शासन ऐसे ही चलाना है
हद से गुज़र..................
पहले भी तो ऐसा था, बेईमान सारे थे
कोशिशें छुपाने की, करते थे मगर
अब विरोध हो जाए, लोग त्रस्त हो जाएं
सीना तान कर खड़े हैं, शर्म है न डर
कैसा आ गया ज़माना है
हद से गुज़र..................