Thursday, April 18, 2013

ये तो इब्तिदा* है, अभी अंजाम बांकी है
रहने दो अभी, प्यालों में जाम बांकी है

उसे भूलने की क्या ज़रुरत है भला
अभी उल्फत हमारे, दरमयान बांकी है

किस-किस का नाम लूं कि गम दिया किसने
अभी गिनते रहो, बहुत से नाम बांकी है

कुछ दुश्मनों से अदावत* की बात करनी  है
कुछ दोस्तों का अभी एहतराम* बांकी है

ए मौत रुक तो जा थोड़ी और मोहलत दे
कुछेक ख्वाहिश है अभी, कुछेक काम बांकी है

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इब्तिदा*   - शुरुआत
अदावत*   - दुश्मनी
एहतराम* - सम्मान, स्वागत 

Saturday, January 19, 2013

अब तो आ जाओ

ज़िन्दगी सहरा* हुआ है, अब तो आ जाओ
घर बहुत बिखरा हुआ है, अब तो आ जाओ

दिन तो फिर भी ढल गया, अब रात बाकी है
जी बहुत घबरा रहा है, अब तो आ जाओ

कल तक कहो आने को मैंने तुम्हे तकलीफ दी
मामला गहरा हुआ है, अब तो आ जाओ

तर्क-ए-वफ़ा* के बाद से तो ज़िन्दगी रुक ही गई
पल वहीँ ठहरा हुआ है, अब तो आ जाओ

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सहरा* - खाली मैदान, रेगिस्तान
तर्क-ए-वफ़ा* - बेवफा हो जाना 

Monday, January 14, 2013

यादों का तिनका

कोई
बेरहम,बेपरवाह,बेतकल्लुफ*
हवा का झोंका
तेरी यादों के
तिनके उड़ा लाया था कभी
वो तिनका
अब तलक फँसा है
आँखों में
और
हर इक पल
टीसता है
सालता है
चुभता है मुझे
और
अब ये डर है
कि इससे निकलने वाले
अश्क
तुम्हारे घर में
सैलाब न ले आएं
कभी

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बेतकल्लुफ* - निस्संकोच 

Sunday, September 30, 2012

भौतिकता

बचपन से ही वो कृत्तिमता में जीता आया था,
अपनी गाड़ी में घूमना,
उपकरणों के साथ खेलना,
और एक कमरे में कैद रहना,
यही उसने सीखा था
वहाँ,
न तो सूरज की रोशनी जाती थी,
न हवा का दखल था,
न ही लोगों का प्रवेश
प्रकृति से दूर,
समाज से विखंडित,
जी रहा था वो
अब जबकि उसे बाहर निकलना पड़ा है,
सूरज की किरणे उसे चुभ रही हैं,
हवा के थपेड़े उसे भेद रहे हैं,
लोगों का साथ उसे खिन्न कर रहा है
और अब उसे अपने अतीत पर अफ़सोस हो रहा है




Thursday, September 27, 2012

वक़्त फ़ितरतन टिक कर नहीं रहता
आज वो तेरा है, तो कल मेरा भी होगा

हर रात के उस पार उजाला ही होता है
आज अँधेरा है, तो कल सवेरा भी होगा

आज जो मकां तुम्हे खंडहर सा दीखता है
वहीँ कल देखना लोगों का बसेरा भी होगा

गो उस पेड़ के क़िस्मत में आज सेहरा है
मगर कल वहीँ शादाब का डेरा भी होगा




Tuesday, September 25, 2012

तेरे दिए ग़मों को जब एक जगह रक्खा
देखा कि ये ग़ज़लों का दीवान बन गया

वो तेरा पास आ कर फिर से चले जाना
उससे ये काम और भी आसान बन गया

कैसे बताऊँ तुमको तेरा रूठ के जाना
मेरे लिए तो मौत का फरमान बन गया

हर हर्फ़ हर एक नुक्ता तुम ही तो हो शामिल
ये दीवान मेरे इश्क का पहचान बन गया  

Sunday, September 23, 2012

काश ! कभी ऐसा भी होता

काश ! कभी ऐसा भी होता
तू भी मुझसे प्रीत निभाती
काश ! कभी ऐसा भी होता
तू भी मुझको पास बुलाती
काश ! कभी...................


तेरे मेरे सपने दोनों
कदम मिलाकर साथ में चलते
दृश्य बदलता वक़्त बदलता
पर न प्रेम के सूरज ढलते
मेरे उपवन के पुष्प-कुसुम
तेरे उपवन को भी महकाती
काश ! कभी...................


मेरे अंतर की पीड़ा
बनती तेरी भी करुण कहानी
तेरे मन का पुलकित होना
मेरे खुश होने की निशानी
मधुर गीत मेरे मन का
तेरे मन को झंकृत कर जाती
काश ! कभी...................