Wednesday, January 25, 2012

क्या वो भी घबराई होगी ?

स्मृति मेरी, उसकी आँखों 
में आँसू क्या लायी होगी ?
क्या वो भी घबराई होगी ?

उसकी जाने कितनी यादें 
अब भी चलते साथ मेरे ,
उससे की अनगिन संवादें 
अब भी रहते पास मेरे ,
पर जो अर्जी है इस दिल की 
क्या उसकी सुनवाई होगी ?
क्या वो भी...................

मैं अब भी अपने सपनों का 
आधार उसी से पाता हूँ ,
मैं अब भी अपने जीवन का 
श्रृंगार उसी से पाता  हूँ ,
पर जो साथी छूट गया 
क्या उसकी भरपाई होगी ?
क्या वो भी................ 



  

Thursday, January 19, 2012

निरस्त उत्सव

नया वर्ष है,नयी सुबह है
पर मेरे आँखों में पानी 
मेरी बातें वही पुरानी 

क्या बदला इस नए वर्ष में 
जो मैं इसका जश्न मनाऊँ,
मेरा हिस्सा कहाँ हर्ष में 
जो मैं भी शामिल हो जाऊँ,
सबके वक़्त बदलते होंगे 
मेरी रहती वही कहानी 
मेरी बातें................


क्या पाया इस नए साल में
जो मैं भी इस पर इठलाऊँ,
क्या है अंतर मेरे हाल में 
जो मैं गीत ख़ुशी का गाऊँ,
आया होगा सूरज सब घर 
पर तम की मुझपर मनमानी 
मेरी बातें................  







Friday, November 18, 2011

पर क्या करें कि

जी करता है ज़रा फुरसत के पल जिऊँ,
पर क्या करें कि दुनिया में काम बहुत है

मजलिस* में जाने कि है आरज़ू उभरी,
पर क्या करें कि सर पर इल्ज़ाम बहुत है

सोचता हूँ चाल सियासी भी सीख लूँ,
पर क्या करें कि जुबां बेलगाम बहुत है

हसरत हुई मुझको भी दिल लगाने की,
पर जफ़ा* का इसमें इंतज़ाम बहुत है

बरकत है इस शहर में लोगों से है सुना,
पर क्या कहें चारों-तरफ कोहराम बहुत है


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मजलिस - सभा,महफ़िल  
जफ़ा - अत्याचार 



Friday, October 7, 2011

उलझन के दिन बीत रहे हैं

उलझन के दिन बीत रहे हैं
दिन उलझन में बीत रहे हैं

                  एक पल में मैं आशावादी
                  अगले पलक निराशावादी ,
                  एक पल जो मानूं ऊंचाई
                  अगले क्षण वो गहरी खाई
कोरी आशा , मृगतृष्णा के
निष्ठुर दिन वे धूर्त रहे हैं
दिन उलझन में........
                 
                    एक पल को मैं हार से डरता
                    अगले क्षण प्रतिकार हूँ करता ,
                    एक पल कोई लगता प्यारा
                    अगले पल न रहे हमारा
कभी जटिलता,कभी कठिनता
दिन ये बड़े अविनीत* रहे हैं
दिन उलझन में......

                     एक पल लक्ष्य है अपना लगता
                     अगले क्षण सब सपना लगता ,
                     एक पल को लगता है सवेरा
                     अगले क्षण बस घोर अँधेरा
साक्षी इस दुविधा के मेरे
कई छंद ओ गीत रहे हैं
दिन उलझन में........


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अविनीत - निष्ठुर,निर्दयी


                 

Friday, September 30, 2011

नाला-ए-दिल*


जिक्र-ए-खयालात का मौका तो दिया होता
यूँ भी क्या था जाना इत्तला* तो किया होता 

 हम भी समंदर की वो गहराई माप लेते 
आँखों में अपने खोने का मौका जो दिया होता 

हम जीस्त* काट लेते उस ख़याल के सहारे 
मिलने का कभी तुमने वादा तो किया होता 

बदनाम हम न होते,कुचों* में नुक्कड़ों पर 
गर बज़्म* में तुमने हमें रुसवा* न किया होता 

दीवान दर्द-ओ-ग़म का मुक़म्मल* न होने पाता
गर कर गिरफ़्त इश्क में धोखा न दिया होता  

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नाला-ए-दिल - ह्रदय से निकलने वाला आर्तनाद  
इत्तला - सूचना
जीस्त - ज़िन्दगी 
कुचों -  गलिओं 
बज़्म - महफ़िल 
रुसवा - अपमानित 
मुक़म्मल - पूरा 

Tuesday, September 27, 2011

गुज़रा ज़माना

 वो दिन थे जब रोज़ होती थी मुलाकातें
अब नज़रों का मिलना भी इत्तफ़ाक लगता है 

इक वक़्त था जब शफ़क* से मोहब्बत थी मुझको
अब सूरज का उगना भी मज़ाक लगता है  

किसी ज़माने में खुशियों की चाहत थी मुझको
अब मसर्रत* से खूबसूरत अज़ाब* लगता है 

कभी तसव्वुर* से भी जिसके सुकून मिलता था 
अब ख्याल-ए-वस्ल* भी उदास लगता है 

जंग-ए-मोहब्बत में गर नाकाम हो गए
तब ज़िन्दगी बस दर्द का हिसाब लगता है 

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शफ़क - सवेरे या शाम की लालिमा जी क्षितिज पे होती है 
मसर्रत - ख़ुशी,आनंद  
अज़ाब - दुःख,कष्ट  
तसव्वुर -  ख्याल 
ख्याल-ए-वस्ल - मिलने का विचार 



   

Saturday, September 10, 2011

फिर क्यूँ गाऊं मन बहलाऊं

न मैं आया न तुम आये, ये वर्तमान फिर बीत गया 
कुछ टूट गए कुछ तोड़े गए, ये पुष्प्वृक्ष फिर रीत* गया 

न मैंने कहा न तुमने सुना, ये नीरवता* फिर जीत गया
न स्वर ही रहा न राग बचा, फिर व्यर्थ ही ये उद्गीत* गया

जिसने भी दिया बस छल ही दिया, न मुख कोई निर्लिप्त* गया
मैं भी पा लेता प्रेम मगर, ये भी वांछन* अतृप्त गया 

जो स्वप्न बुने वो टूट गए, न शौक कोई परितृप्त* गया
जिसको चाहा वो छूट गए, न दीप कोई संदीप्त* गया

न आस कोई परिहास* कोई, अब निज भरोस भी टूट गया
फिर क्यूँ गाऊं मन बहलाऊं, जब साज ह्रदय का छूट गया

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रीत - खाली होना 
नीरवता - निशब्दता 
उद्गीत - उचें स्वर में गया हुआ गाना
निर्लिप्त - बिना लेप चढ़ाया हुआ  
वांछन - इच्छा 
परितृप्त - अच्छी तरह संतुष्ट 
संदीप्त - जला हुआ 
परिहास - हास्य,विनोद