Tuesday, September 1, 2020

ये क्या हो रहा है

ये क्या हो रहा है
ये क्यूँ हो रहा है
समय बिंदु पर एक
दिवस से खड़ा है

                          नहीं ऐसा देखा
                          था पहले कभी भी,
                          न फ़ितरत ही इसकी
                          यूँ लगती थी ऐसी,
                          कि टिक कर रहेगा
                          ये एक अंक पर ही,
                          ये *बेमिस्ल मंज़र
                          मगर दिख रहा है
                          समय बिंदु पर एक.......

ये ठहरा हुआ है
या भ्रम हो रहा है,
अगर यह थमा है
तो क्यूँकर थमा है,
ये फिर कब चलेगा
या यूँही रहेगा,
ये किसको ख़बर है
ये किसको पता है
समय बिंदु पर एक.......

                         या मैं रुक गया हूँ
                         सफ़र में यकायक,
                         तो यूँ लग रहा है
                         समय रुक गया है,
                         नहीं जानता हूँ
                         नहीं जान सकता
                         ये जैसी है उलझन
                         ये जो मसअला है
                         समय बिंदु पर एक.......

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*बेमिस्ल =अद्वितीय, अनोखा , जो पहले नहीं हुआ हो
                       


Sunday, April 5, 2020

जीवन

चाहे जैसा भी हो जीवन,
धीरे-धीरे, रहते-रहते
एक आदत सी पड़ जाती है ।

हाँ, आदत तो पड़ जाती है
पर आदत पड़ने के क्रम में,
समझौते करते रहते हैं
पीड़ा भी सहते रहते हैं
क्रमशः एक दिन वो आता है
जब हम ख़ुद को खो देते हैं

हम जब ख़ुद को खो देते हैं
तब जाकर पड़ती है आदत
वैसे जीवन में ढलने की
वैसी राहों पे चलने की
जिसपे हमने पहले ख़ुद को
ना देखा है, ना पाया है

ना देखा है, ना पाया है
पर ये कैसा निर्मम जीवन
जिसने हमको सब दिखलाया
जिसमें हमने सोचा क्या था
और जिसमें हमने क्या पाया
हाँ, पर आदत पड़ जाती है
चाहे जैसा......................

Friday, March 27, 2020

कोट



एक कोट जो अब
तक़रीबन एक हफ़्ते से
टंगा हुआ है खूँटी पर
सिलवटों पर अब जिसकी
धूल की कई परतें जम गई हैं

फ़ुर्सत के पहले दो-तीन दिनों में उसने आराम किया
कोहनी से अपनी बाज़ूओं को
मोड़कर छाती तक ले गया
अपने फेफड़ों में राहत की लम्बी सांसें भरी
और देर तक सोता रहा

पर यूँ है कि उसे,
रोज़ निकलने कि इक आदत सी रही है
हाँ, बहुत इस्तेमाल होने पर
कभी-कभी शिक़ायत किया करता था
दबी आवाज़ में ,
पर फ़ितरतन इतना आराम-पसंद कभी न रहा

कल मैंने देखा कि उसके बाज़ू फड़फड़ा रहे थे
धूप को, आकाश को,
अब्र को, माहताब को,
और *मंज़र-ए-आम देखने को
शायद

हाँ, उसे रोज़ सैकड़ों लोगों से मिलने की आदत सी रही है
और आदत रही है उसे एक शरीर पहनने की 
अब उसे ये ख़ालीपन खाए जा रहा है

टंगा है वो *मुंजमिद
उस सुब्ह की आस में
जब उसपे जमे धूल साफ़ किये जाएंगे
और दिया जाएगा उसे वापिस वो शरीर
जिसके बाज़ू और छाती
ठीक उसके नाप के बने हैं
और जिसे पहनकर वो निकलेगा बाहर
*तलाश-ए-रिज़्क़ में
पहले कि तरह

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*मंज़र-ए-आम = खुला दृश्य
*मुंजमिद = जमा हुआ
*तलाश-ए-रिज़्क़ = रोज़गार की तालाश




Monday, April 15, 2019

फिर जाने क्यों इठलाता है

ये सृष्टि व्यवस्था *विप्लव कर
मानव विध्वंस बुलाता है
फिर जाने क्यों इठलाता है

              ये चाँद, गगन, ब्रह्मांड सकल
              अपने अपने स्थान अटल
              उस पर फिर सूरज गगन मध्य
              आता तम में आलोक लिए
पर मानव ऐसा मूढ़ जीव
इस पद्धति को झुठलाता है
फिर जाने.......................

               अनगिन तत्वों से मिलकर जग
               रहने लायक यह हुआ है तब
               उस पर फिर कितने जीव-जन्तु
               है सबका कुछ अपना महत्व
पर मानव *मिथ्यागर्व चूर
खुद को सर्वोच्च बताता है
फिर जाने.......................

               ये नदी, पेड़, वायु, पर्वत
               सब दिखते हैं अब *मर्माहत
               बारिश, मौसम, जंगल, उपवन
               सम्पूर्ण व्यवस्था उथल-पुथल
मानव इसका शोषण करके
खुद अपनी चिता सजाता है
फिर जाने.......................

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*विप्लव    = नष्ट, बर्बाद
*मिथ्यागर्व = झूठा अभिमान
*मर्माहत   = चोटिल 

Thursday, December 13, 2018

ग़ज़ल


यूँहि मेरे साथ वो चलता चला गया
नज़्म में हरेक उतरता चला गया

था कोई तिलिस्म* या उसकी थी रहबरी*
तीरगी* में नूर जो भरता चला गया

उसके होंठ उसकी नज़र और वो छुअन
नश्शा रफ़्ता-रफ़्ता ये बढ़ता चला गया

कैसा था वो राहगुज़र* कैसा था समा
आँखों में वो चाँद उतरता चला गया

बँध सका हुदूद* में ये आज तक कहाँ
इश्क़ का ख़ुमार था चढ़ता चला गया

कैसा दौर है ये हुकूमत का देश में
नाम हर नगर का बदलता चला गया


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तिलिस्म* = जादू
रहबरी* = राह दिखाना, Comanionship, Guidance
तीरगी* = अंधेरा
राहगुज़र* = रास्ता
हुदूद* = सीमा

Monday, February 26, 2018

हाँ ऐसा है लगता मुझको

हाँ ऐसा है लगता मुझको


            तुम कल्पित हो, सत्य नहीं तुम 
            एक रहस्य सा, व्यक्त नहीं तुम 
            अंतर तेरा, एक अथाह है 
            नहीं समाहित, उसमें क्या है 
ठीक-ठाक तो समझ न पाया 
पर कुछ ऐसा लगता मुझको 
हाँ ऐसा है...........................


             तुम पूरित हो, पर अशेष तुम
             सहज सरल हो, पर विशेष तुम 
             अनगिन पहलू, समाविष्ट हैं
             सब हैं अद्भुत, सब विशिष्ट हैं 
दुनिया तुमको समझ न पाई
पर है ऐसा लगता मुझको
हाँ ऐसा है......................


               सतत प्रकाशित, एक चराग तुम
               आदर्शीकृत, एक पड़ाव तुम
               नहीं है संभव, वर्णन तेरा
               किसी चित्र में, चित्रण तेरा 
रख लूँ तुझको मैं कविता में
पर मेरा मन कहता मुझको
हाँ ऐसा है......................... 

Sunday, December 10, 2017

इंतज़ार

मैं तुम्हारे बग़ैर हो जाता हूँ
रोते बच्चों के लिए
खाने की तलाश में निकली
एक ग़रीब माँ की तरह
बेचैन, बेकल
भागता रहता हूँ
घर के एक कोने से
दूसरा कोना,
दुसरे से तीसरा
और फिर घूमकर वापिस
आ जाता हूँ उसी कोने पर
देर तक ऐसा करने के बाद भी
जब कहीं कुछ नहीं मिलता
थक कर बैठ जाता हूँ एक कोने में
स्तभ्ध, हताश
निरुपाय, निराश
शून्य को तकता
अपनी सुबह की इंतज़ार में