Monday, April 15, 2019

फिर जाने क्यों इठलाता है

ये सृष्टि व्यवस्था *विप्लव कर
मानव विध्वंस बुलाता है
फिर जाने क्यों इठलाता है

              ये चाँद, गगन, ब्रह्मांड सकल
              अपने अपने स्थान अटल
              उस पर फिर सूरज गगन मध्य
              आता तम में आलोक लिए
पर मानव ऐसा मूढ़ जीव
इस पद्धति को झुठलाता है
फिर जाने.......................

               अनगिन तत्वों से मिलकर जग
               रहने लायक यह हुआ है तब
               उस पर फिर कितने जीव-जन्तु
               है सबका कुछ अपना महत्व
पर मानव *मिथ्यागर्व चूर
खुद को सर्वोच्च बताता है
फिर जाने.......................

               ये नदी, पेड़, वायु, पर्वत
               सब दिखते हैं अब *मर्माहत
               बारिश, मौसम, जंगल, उपवन
               सम्पूर्ण व्यवस्था उथल-पुथल
मानव इसका शोषण करके
खुद अपनी चिता सजाता है
फिर जाने.......................

.............................................................
*विप्लव    = नष्ट, बर्बाद
*मिथ्यागर्व = झूठा अभिमान
*मर्माहत   = चोटिल 

Thursday, December 13, 2018

ग़ज़ल


यूँहि मेरे साथ वो चलता चला गया
नज़्म में हरेक उतरता चला गया

था कोई तिलिस्म* या उसकी थी रहबरी*
तीरगी* में नूर जो भरता चला गया

उसके होंठ उसकी नज़र और वो छुअन
नश्शा रफ़्ता-रफ़्ता ये बढ़ता चला गया

कैसा था वो राहगुज़र* कैसा था समा
आँखों में वो चाँद उतरता चला गया

बँध सका हुदूद* में ये आज तक कहाँ
इश्क़ का ख़ुमार था चढ़ता चला गया

कैसा दौर है ये हुकूमत का देश में
नाम हर नगर का बदलता चला गया


....................................
तिलिस्म* = जादू
रहबरी* = राह दिखाना, Comanionship, Guidance
तीरगी* = अंधेरा
राहगुज़र* = रास्ता
हुदूद* = सीमा

Monday, February 26, 2018

हाँ ऐसा है लगता मुझको

हाँ ऐसा है लगता मुझको


            तुम कल्पित हो, सत्य नहीं तुम 
            एक रहस्य सा, व्यक्त नहीं तुम 
            अंतर तेरा, एक अथाह है 
            नहीं समाहित, उसमें क्या है 
ठीक-ठाक तो समझ न पाया 
पर कुछ ऐसा लगता मुझको 
हाँ ऐसा है...........................


             तुम पूरित हो, पर अशेष तुम
             सहज सरल हो, पर विशेष तुम 
             अनगिन पहलू, समाविष्ट हैं
             सब हैं अद्भुत, सब विशिष्ट हैं 
दुनिया तुमको समझ न पाई
पर है ऐसा लगता मुझको
हाँ ऐसा है......................


               सतत प्रकाशित, एक चराग तुम
               आदर्शीकृत, एक पड़ाव तुम
               नहीं है संभव, वर्णन तेरा
               किसी चित्र में, चित्रण तेरा 
रख लूँ तुझको मैं कविता में
पर मेरा मन कहता मुझको
हाँ ऐसा है......................... 

Sunday, December 10, 2017

इंतज़ार

मैं तुम्हारे बग़ैर हो जाता हूँ
रोते बच्चों के लिए
खाने की तलाश में निकली
एक ग़रीब माँ की तरह
बेचैन, बेकल
भागता रहता हूँ
घर के एक कोने से
दूसरा कोना,
दुसरे से तीसरा
और फिर घूमकर वापिस
आ जाता हूँ उसी कोने पर
देर तक ऐसा करने के बाद भी
जब कहीं कुछ नहीं मिलता
थक कर बैठ जाता हूँ एक कोने में
स्तभ्ध, हताश
निरुपाय, निराश
शून्य को तकता
अपनी सुबह की इंतज़ार में

Monday, August 14, 2017

ये जज़्बों का कैसा

ये जज़्बों का कैसा, है सूखा पड़ा अब 
एक अरसा है गुज़रा, नहीं लिक्खी मैंने 
ग़ज़ल-नज़्म कोई

जो होती थी पहले, अजब कुलबुलाहट
मेरे मन के अंदर, 
जो दीखता था कोई, मुझे रोता बच्चा,
या लगती थी अच्छी, हँसी जब किसी की  
तो लगता था जैसे,
कि लिख दूँ मैं सब कुछ ही नज़्मों मैं अपने 
मगर जाने क्यों अब, नहीं होता ये सब 
नहीं फ़र्क़ पड़ता है, मुझको कोई अब 
ये जज़्बों का कैसा............................

Thursday, April 13, 2017

ज़िन्दगी

मैं इक ख़ौफ़नाक मौत था
और तुम इक मुक़म्मल ज़िन्दगी
तुमने मुझे गले लगाया
और मैं जी उठा
शायद पहली बार मौत,
ज़िन्दगी से
हार गई

Monday, April 3, 2017

कौन है ये?

कौन है ये जो
धीरे-धीरे, चुपके-चुपके
चोर क़दम से, बैठ गया है
पहलू मेरे,  सिरहाने में

कौन है ये जो
लगता है यूँ, देखके जिसको
मैं बागों में, खेलूँ फिर से
मैं बारिश में, भीगूँ फिर से

कौन है ये जो
लगता है यूँ, देखके जिसको
रात गुज़ारूँ, छत पर बैठे 
बेमतलब की, बातें करते 

कौन है ये जो
लगता है यूँ, देखके जिसको
मैं जीने लग जाऊँ फिर से
मैं नज़्में लिख जाऊँ फिर से
कौन है ये जो