Monday, April 3, 2017

कौन है ये?

कौन है ये जो
धीरे-धीरे, चुपके-चुपके
चोर क़दम से, बैठ गया है
पहलू मेरे,  सिरहाने में

कौन है ये जो
लगता है यूँ, देखके जिसको
मैं बागों में, खेलूँ फिर से
मैं बारिश में, भीगूँ फिर से

कौन है ये जो
लगता है यूँ, देखके जिसको
रात गुज़ारूँ, छत पर बैठे 
बेमतलब की, बातें करते 

कौन है ये जो
लगता है यूँ, देखके जिसको
मैं जीने लग जाऊँ फिर से
मैं नज़्में लिख जाऊँ फिर से
कौन है ये जो 

Saturday, March 11, 2017

कविता-संसार कहूँ तुमको

कविता-संसार कहूँ तुमको

              मृतप्राय* भावों को तुमने
              फिर प्रेम दिया, नव प्राण दिया
              मन की खंडित आशाओं को
              सम्मान दिया, अरमान दिया
इसीलिए शब्दों में वर्णित
सोचा एक बार करूँ तुमको
कविता-संसार....................


               तुम तब आये मिलने मुझसे
               जब एकाकी था मैं पथ पर
               शीतलता दी मन को मेरे
               जब सूर्य प्रखर जीवन नभ पर
इसीलिए छंदों में चित्रित
सोचा एक बार करूँ तुमको
कविता-संसार....................


                तेरी ममता से संचारित
                निष्प्राण* देह में पुनः श्वास
                और संकट काल मिले जैसे
                मन को राहत का उच्छवास*
जीवन से कविता में उद्ध्रित*
सोचा एक बार करूँ तुमको
कविता-संसार....................



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मृतप्राय*   = मरा हुआ सा
निष्प्राण*   = मरा हुआ
उच्छवास* = उसाँस
उद्ध्रित*    = एक जगह से दूसरे जगह लेना

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Saturday, January 7, 2017

अब मैं नज़्में नहीं लिखूँगा

अब मैं नज़्में नहीं लिखूँगा

          तुम परिधि सकल कविताओं की
          अनिवार्य तत्व रचनाओं की
इसीलिए अब तेरे बिन मैं
पोली* ग़ज़लें नहीं कहूँगा
अब मैं........................


           जीवन में मधुरस था तुमसे
           ये अश्रु धार भी था तुमसे
इसीलिए इन भावों को मैं
व्यक्त कभी अब नहीं करूँगा
अब मैं........................


            अर्पित तुमको कविताएं सब
            पूरा सर्जन तेरा ही अब
अपनी पीड़ाओं को अब मैं
अपने अंदर ही रख लूँगा
अब मैं........................


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पोली* = खोखली


            

Saturday, December 31, 2016

ह्रदय हुआ आबाद न अब तक

ह्रदय हुआ आबाद न अब तक
     
        कितने सावन आए गुज़रे
        कितने मंज़र मन में उतरे
        वादे कितने किए सभी ने
        फिर वो वादे टूटे बिखरे
चाह मुझे थी तारों की पर
मिला मुझे आकाश न अब तक
ह्रदय हुआ............................


        कितने लोग सफर में आये
        कितने मिलकर हुए पराये
       अकस्मात ही, पूर्व समय से        
       कुछ जो फूल खिले, मुरझाए
चाह मुझे उन्मत्त रहूँ पर
मिला मुझे उन्माद न अब तक
ह्रदय हुआ............................


         कितनी खुशियां फिसली छू कर
         सपने ठहरे बस कुछ क्षण भर
         जीवन मेरा चलता जैसे
         निर्जन राही दुर्गम पथ पर
चाह मुझे थी साथी की पर
मिला किसी का हाथ न अब तक
ह्रदय हुआ............................

Tuesday, December 27, 2016

परछाई

कल चाँद आया था क़ैफ़ियत* पूछने
तुम्हारे जाने का अंदाज़ा
हो गया था उसे
मेरी मायूसी देखकर
शायद
और
जवाब देने को मैंने
जैसे ही उठाई
नज़रें अपनी
लौट गया वो
जल कर मानो
बिना सुने ही

मेरी आँखों में
तुम्हारा चेहरा दीखता है क्या ?

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क़ैफ़ियत* = हाल



Thursday, December 15, 2016

ये निशा नहीं जाने वाली

ये निशा नहीं जाने वाली
               
             सूरज आता अब भी नभ में
             पर तिमिर नहीं जाता है अब
             कितनी रातें हैं गुज़र गई
             क्यूँ भोर नहीं होता है अब
             मुझको लगता सूरज किरणें
             अब यहाँ नहीं आने वाली
             ये निशा....................


             आशा बंधती है एक पल को
             फिर तितर बितर सब हो जाता
             सपना कोई जो देख लिया
             निश्चय ही खंडित हो जाता
             मुझको लगता इस ओर कभी
             अब खुशी नहीं आने वाली
             ये निशा....................


             तुमको सब था मालूम मगर
             फिर भी मुख तुमने फेर लिया
             मेरे हिस्से जो था जीवन
             सब धीरे-धीरे छीन लिया
             मुझको लगता है अब कोयल
             मधु गीत नहीं गाने वाली
             ये निशा....................






Friday, December 9, 2016

ग़ज़ल

सब कुछ लगता मुब्हम* सा है
तेरे जाने का ग़म सा है

जो मुमकिन हो तो रह जाओ
जाना तेरा मातम सा है

बस दुश्वारी दिखती इसमें
पथ तेरे बिन दुर्गम* सा है

जाने से तेरे इस घर का
हर एक कोना बरहम* सा है

हो फुरसत तो मुड़कर देखो
दश्तो आलम* पुरनम* सा है

ये जीवन तेरे बिन गोया
कुछ आधा है कुछ कम सा है


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१. मुब्हम           - अस्पष्ट
२. दुर्गम            -  दुस्तर, विकट
३. बरहम          -  अस्त-व्यस्त
४. दश्तो आलम - दुनिया, संसार
५. पुरनम          -  गीला, भीगा