Thursday, May 3, 2012

तो और बात होती

यूँ तो कई लोग मिरे आसपास हैं ,
जो तिरा साथ होता, तो और बात होती 

कई लोग जश्न में शामिल तो हैं मगर ,
जो तूं शरीक होता, तो और बात होती  

वैसे हैं कम नहीं मिरे भी ग़मगुसार* ,
पर तूं जो बाँट लेता, तो और बात होती 

मुझको सँभालने को उठे कई हाथ हैं ,
जो तिरा हाथ होता, तो और बात होती  

रूठने पे लोग यूँ मनाने आये हैं ,
जो तूं मनाने आती, तो और बात होती  


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ग़मगुसार - ग़म  दूर करने वाला 

Monday, April 30, 2012

निर्धन और कवि

मैं, तेरी कविता का इंधन हूँ ,
हाँ, निस्सहाय एक निर्धन हूँ  


जो लिख लो मुझपे कविताएँ 
जग भर प्रसिद्धि पा जाओगे ,
मेरी लाचारी वही रहे पर 
तुम तो कवि कहलाओगे 
तुम मानो या न मानो पर 
तेरी उन्नति का साधन हूँ 
हाँ, निस्सहाय............


मैंने भी देखी है दुनिया 
बहुतों को लिखते देखा है ,
बस्ती में अमीरों की मैंने 
निर्धनता बिकते देखा है 
खुद रोटी को लाचार हूँ पर 
तेरे ऐश्वर्य का माध्यम  हूँ 
हाँ, निस्सहाय............


कितनों ने किये कोड़े वादे 
कितनों ने भरोसे को तोड़ा ,
बस पुरस्कार पा जाने तक 
मुझसे सबने नाता जोड़ा 
खुद का जीवन एक पतझर है 
पर तेरी ख्याति का उपवन हूँ 
हाँ, निस्सहाय............
      

Friday, March 2, 2012

हाय! ये किसकी हाय लगी

कितने देखे थे स्वप्न मगर
टूटा सब चकनाचूर हुआ
वो एक सितारा था प्यारा
डूबा तो घर बेनूर हुआ
हाय! ये किसकी हाय लगी


मेरे स्वर का झंकार था वो
हर पल जैसे दरकार था वो
सब सपनों का विस्तार था वो
हर क्षण में मिलता प्यार था वो
उसको छीना क्यूँ ईश्वर ने
क्या मुझसे कहो कसूर हुआ
हाय! ये......................

मेरे सुख का आह्वान था वो
मेरे दुःख का अवसान था वो
उत्तम पथ का निर्माण था वो
हर क्षण में बसता नाम था वो
बस उसको माँगा था प्रभु से
जाने क्यूँ नामंजूर हुआ
हाय! ये......................

सारे मसले का हल था वो
मैं प्यासा था तो जल था वो
सुन्दर अतीत का कल था वो
आने वाला हर पल था वो
उसका ही दिया ये जीवन था
जो बिन उसके निर्मूल हुआ
हाय! ये......................
 

Wednesday, January 25, 2012

क्या वो भी घबराई होगी ?

स्मृति मेरी, उसकी आँखों 
में आँसू क्या लायी होगी ?
क्या वो भी घबराई होगी ?

उसकी जाने कितनी यादें 
अब भी चलते साथ मेरे ,
उससे की अनगिन संवादें 
अब भी रहते पास मेरे ,
पर जो अर्जी है इस दिल की 
क्या उसकी सुनवाई होगी ?
क्या वो भी...................

मैं अब भी अपने सपनों का 
आधार उसी से पाता हूँ ,
मैं अब भी अपने जीवन का 
श्रृंगार उसी से पाता  हूँ ,
पर जो साथी छूट गया 
क्या उसकी भरपाई होगी ?
क्या वो भी................ 



  

Thursday, January 19, 2012

निरस्त उत्सव

नया वर्ष है,नयी सुबह है
पर मेरे आँखों में पानी 
मेरी बातें वही पुरानी 

क्या बदला इस नए वर्ष में 
जो मैं इसका जश्न मनाऊँ,
मेरा हिस्सा कहाँ हर्ष में 
जो मैं भी शामिल हो जाऊँ,
सबके वक़्त बदलते होंगे 
मेरी रहती वही कहानी 
मेरी बातें................


क्या पाया इस नए साल में
जो मैं भी इस पर इठलाऊँ,
क्या है अंतर मेरे हाल में 
जो मैं गीत ख़ुशी का गाऊँ,
आया होगा सूरज सब घर 
पर तम की मुझपर मनमानी 
मेरी बातें................  







Friday, November 18, 2011

पर क्या करें कि

जी करता है ज़रा फुरसत के पल जिऊँ,
पर क्या करें कि दुनिया में काम बहुत है

मजलिस* में जाने कि है आरज़ू उभरी,
पर क्या करें कि सर पर इल्ज़ाम बहुत है

सोचता हूँ चाल सियासी भी सीख लूँ,
पर क्या करें कि जुबां बेलगाम बहुत है

हसरत हुई मुझको भी दिल लगाने की,
पर जफ़ा* का इसमें इंतज़ाम बहुत है

बरकत है इस शहर में लोगों से है सुना,
पर क्या कहें चारों-तरफ कोहराम बहुत है


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मजलिस - सभा,महफ़िल  
जफ़ा - अत्याचार 



Friday, October 7, 2011

उलझन के दिन बीत रहे हैं

उलझन के दिन बीत रहे हैं
दिन उलझन में बीत रहे हैं

                  एक पल में मैं आशावादी
                  अगले पलक निराशावादी ,
                  एक पल जो मानूं ऊंचाई
                  अगले क्षण वो गहरी खाई
कोरी आशा , मृगतृष्णा के
निष्ठुर दिन वे धूर्त रहे हैं
दिन उलझन में........
                 
                    एक पल को मैं हार से डरता
                    अगले क्षण प्रतिकार हूँ करता ,
                    एक पल कोई लगता प्यारा
                    अगले पल न रहे हमारा
कभी जटिलता,कभी कठिनता
दिन ये बड़े अविनीत* रहे हैं
दिन उलझन में......

                     एक पल लक्ष्य है अपना लगता
                     अगले क्षण सब सपना लगता ,
                     एक पल को लगता है सवेरा
                     अगले क्षण बस घोर अँधेरा
साक्षी इस दुविधा के मेरे
कई छंद ओ गीत रहे हैं
दिन उलझन में........


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अविनीत - निष्ठुर,निर्दयी